Hindi Grammar MCQs In Hindi
अगर आप चाहते हैं कि आपकी बात में वज़न हो और लोग उसे गंभीरता से लें, तो Hindi Grammar पर कमांड होना सिर्फ एक ज़रूरत नहीं, बल्कि एक बड़ी स्किल है। यह सिर्फ भाषा की शुद्धता तक सीमित नहीं है, बल्कि आपके मैसेज को impactful बनाने का असली ज़रिया है। चाहे आप UPSC, SSC, NDA या किसी भी बड़े Competitive Exam की तैयारी कर रहे हों, व्याकरण की गहरी समझ आपको बाकी भीड़ से काफी आगे रखती है। इसके बारीक नियमों को समझकर आप न केवल सही शब्दों का चुनाव करना सीखते हैं, बल्कि एक प्रभावशाली sentence structure तैयार करने में भी माहिर हो जाते हैं।
व्याकरण में महारत हासिल करने का सबसे बड़ा एडवांटेज आपकी writing skills में नज़र आता है। इसकी मदद से आप अपने थॉट्स को बिना किसी कन्फ्यूजन के बिल्कुल clear और professional तरीके से लिख पाते हैं। जब एग्जाम में निबंध (essay) लिखना हो या इंटरव्यू में खुद को प्रेजेंट करना हो, आपका self-confidence तभी झलकता है जब आपका बेस मज़बूत हो। करियर में बड़ी सफलता पाने के लिए व्याकरण की यह पकड़ आपकी राह को काफी आसान और स्मूथ बना देती है।

‘उर्वरा’ शब्द के लिए वाक्यांश है ?
हिंदी शब्दकोश और व्याकरण के अनुसार ‘उर्वरा’ शब्द का प्रयोग उस भूमि के लिए किया जाता है जिसकी उत्पादन क्षमता अत्यंत उच्च होती है। इसे सरल शब्दों में ‘उपजाऊ भूमि’ कहा जाता है। यह शब्द ‘उर्वर’ से बना है, जिसका अर्थ ही ‘शक्तिशाली’ या ‘प्रजननक्षम’ होता है। प्राचीन भारतीय ग्रंथों में भी धरती को ‘उर्वरा’ कहकर संबोधित किया गया है, क्योंकि वह समस्त जीव-जगत के लिए अन्न और जीवन प्रदान करती है।
इसके विपरीत, जिस भूमि पर कुछ भी उत्पन्न नहीं होता, उसे ‘बंजर’ या ‘ऊसर’ कहा जाता है। ‘उर्वरा’ शब्द का महत्व केवल कृषि तक सीमित नहीं है, बल्कि साहित्य में इसे ‘रचनात्मकता’ के प्रतीक के रूप में भी देखा जाता है। उदाहरण के लिए, एक उर्वर मस्तिष्क वह है जिसमें नवीन और कल्याणकारी विचारों का जन्म होता है। अतः, इस प्रश्न का सबसे सटीक विकल्प ‘उपजाऊ भूमि’ है।
विकारी और अविकारी शब्दों के कितने भेद हैं ?
हिंदी व्याकरण में प्रयोग के आधार पर शब्दों को दो मुख्य श्रेणियों में विभाजित किया गया है: विकारी और अविकारी। विकारी शब्द वे होते हैं जिनमें लिंग, वचन, कारक या काल के प्रभाव से परिवर्तन (विकार) आता है। विकारी शब्दों के चार प्रमुख भेद हैं: संज्ञा, सर्वनाम, विशेषण और क्रिया। उदाहरण के लिए, ‘लड़का’ (संज्ञा) का ‘लड़की’ या ‘लड़कों’ हो सकता है।
दूसरी ओर, अविकारी शब्द वे कहलाते हैं जिनमें किसी भी स्थिति में कोई बदलाव नहीं होता; इन्हें ‘अव्यय’ भी कहा जाता है। इनके भी चार भेद होते हैं: क्रियाविशेषण, संबंधबोधक, समुच्चयबोधक और विस्मयादिबोधक। जैसे ‘धीरे-धीरे’ या ‘किन्तु’ जैसे शब्द हर वाक्य में समान रहते हैं। व्याकरणिक दृष्टि से भाषा की शुद्धता बनाए रखने के लिए इन आठ भेदों (4+4) का ज्ञान होना अनिवार्य है।
‘पर्यावरण’ का सही संधि-विच्छेद है ?
‘पर्यावरण’ शब्द दो शब्दों के मेल से बना है: ‘परि’ और ‘आवरण’। यहाँ संस्कृत व्याकरण की ‘यण स्वर संधि’ का नियम लागू होता है। नियम के अनुसार, जब ‘इ’ या ‘ई’ के बाद कोई अन्य भिन्न स्वर (यहाँ ‘आ’) आता है, तो ‘इ’ का परिवर्तन ‘य्’ में हो जाता है। इस प्रकार, ‘परि + आवरण’ मिलकर ‘पर्यावरण’ बनता है।
शाब्दिक अर्थ को देखें तो ‘परि’ का अर्थ होता है ‘चारों ओर’ और ‘आवरण’ का अर्थ होता है ‘ढका हुआ’ या ‘घेरा’। अर्थात, वह प्राकृतिक घेरा जो हमें चारों ओर से ढके हुए है, पर्यावरण कहलाता है। इसमें जल, वायु, भूमि और समस्त जीवमंडल समाहित हैं। संधि-विच्छेद की यह प्रक्रिया न केवल शब्द निर्माण को समझाती है, बल्कि इसके वास्तविक वैज्ञानिक और भौगोलिक अर्थ को भी स्पष्ट करती है।
‘जीभ’ का पर्याय है ?
हिंदी भाषा में पर्यायवाची शब्दों का अत्यंत महत्व है, जो भाषा की अभिव्यक्ति को समृद्ध बनाते हैं। ‘जीभ’ के लिए ‘रसना’ शब्द का प्रयोग सबसे सटीक माना जाता है। ‘रसना’ शब्द की उत्पत्ति ‘रस’ से हुई है, क्योंकि जीभ का मुख्य कार्य विभिन्न प्रकार के स्वादों (खट्टा, मीठा, कड़वा, नमकीन) का अनुभव कराना है। इसे ‘जिह्वा’ या ‘रसिका’ भी कहा जाता है।
अन्य विकल्पों की बात करें तो ‘वचन’ का अर्थ वाणी या बोल होता है, ‘ध्वनि’ का अर्थ आवाज है, और ‘जीव’ का अर्थ प्राणी या आत्मा होता है। यद्यपि ये सभी बोलने या जीवन से संबंधित हैं, लेकिन ‘जीभ’ अंग के लिए केवल ‘रसना’ ही पर्याय के रूप में प्रयुक्त होता है। काव्य जगत में ‘रसना’ शब्द का प्रयोग अक्सर भक्ति भाव में ‘ईश्वर के नाम का रसास्वादन’ करने के संदर्भ में किया जाता है, जो इसकी भाषाई गरिमा को दर्शाता है।
‘तरंग’ किसका पर्यायवाची है ?
‘तरंग’ शब्द का शाब्दिक अर्थ है ‘लहर’। जब किसी शांत जल स्रोत, जैसे तालाब या समुद्र में हलचल होती है, तो सतह पर जो लहरें उठती हैं, उन्हें तरंग कहा जाता है। इसके अन्य प्रमुख पर्यायवाची शब्द ‘ऊर्मि’, ‘वीचि’, ‘लहर’ और ‘हिलोरे’ हैं। ‘ऊर्मि’ एक तत्सम शब्द है जो अक्सर साहित्यिक रचनाओं में तरंग के स्थान पर प्रयोग किया जाता है।
विकल्प ‘कूल’ और ‘तत’ दोनों का अर्थ ‘किनारा’ होता है, जो तरंग से संबंधित तो हैं लेकिन उसके पर्यायवाची नहीं हैं। वहीं ‘क्षीण’ का अर्थ ‘कमजोर’ या ‘घटा हुआ’ होता है। तरंग न केवल जल की गति को दर्शाती है, बल्कि यह भौतिकी (Physics) में ऊर्जा के संचरण को भी व्यक्त करती है। साहित्य में ‘मन की तरंग’ जैसे मुहावरे मानवीय उत्साह और उमंग को प्रकट करने के लिए उपयोग किए जाते हैं।
दिये गए विकल्पों में से “मारुत” का पर्यायवाची बताइए ?
‘मारुत’ शब्द संस्कृत मूल का है और यह ‘वायु’ या ‘हवा’ का अत्यंत शक्तिशाली पर्यायवाची माना जाता है। हिंदू पौराणिक कथाओं में वायु के देवता को ‘मरुत’ कहा गया है, और इसी कारण हनुमान जी को ‘मारुति’ (मारुत के पुत्र) के नाम से जाना जाता है। वायु के अन्य पर्यायवाची शब्दों में पवन, अनिल, समीर, वात और बयार प्रमुख हैं।
विकल्पों में दिए गए ‘पृथ्वी’ का अर्थ धरा है, ‘तालाब’ का अर्थ जलाशय है और ‘बिजली’ को चपला या दामिनी कहा जाता है। मारुत शब्द विशेष रूप से उस वायु को संबोधित करता है जिसमें वेग और शक्ति होती है। यह शब्द वेदों में भी वर्णित है, जहाँ मरुत गणों को प्रकृति की विध्वंसक और सृजनात्मक दोनों शक्तियों का स्वामी माना गया है। अतः, भाषाई और पौराणिक दोनों दृष्टियों से ‘मारुत’ का अर्थ वायु ही है।
टवर्ग का उच्चारण स्थान है ?
हिंदी वर्णमाला के व्यंजनों को उनके उच्चारण स्थान के आधार पर विभिन्न वर्गों में विभाजित किया गया है। ‘ट’ वर्ग (ट, ठ, ड, ढ, ण) के उच्चारण के समय हमारी जिह्वा का अग्र भाग मुड़कर तालु के कठोर ऊपरी हिस्से को स्पर्श करता है। इस भाग को ‘मूर्धा’ कहा जाता है, इसलिए इन्हें ‘मूर्धन्य’ व्यंजन कहते हैं।
उच्चारण विज्ञान के अनुसार, कंठ से ‘क’ वर्ग, तालु से ‘च’ वर्ग और दंत से ‘त’ वर्ग का उच्चारण होता है। मूर्धन्य ध्वनियों का सही उच्चारण भाषा की स्पष्टता के लिए अनिवार्य है। यदि जीभ मूर्धा को स्पर्श न करे, तो ‘ट’ और ‘त’ वर्ग की ध्वनियों में अंतर करना कठिन हो जाता है। व्याकरण में उच्चारण स्थानों का यह वैज्ञानिक वर्गीकरण न केवल शुद्ध बोलने में सहायक है, बल्कि यह संधि और वर्तनी के नियमों को समझने के लिए भी आधार प्रदान करता है।
निम्नलिखित में पर्यायवाची शब्द हैं ?
पर्यायवाची शब्द वे होते हैं जिनका अर्थ समान होता है। यहाँ ‘नीरज’ और ‘वारिज’ दोनों ही ‘कमल’ के पर्यायवाची हैं। ‘नीर’ का अर्थ जल और ‘वारि’ का अर्थ भी जल होता है, और ‘ज’ प्रत्यय का अर्थ है ‘उत्पन्न होने वाला’। अतः जल में उत्पन्न होने वाले फूल को नीरज या वारिज कहा जाता है।
अन्य विकल्पों का विश्लेषण करें तो: ‘अंबर’ का अर्थ आकाश है जबकि ‘अनिल’ का अर्थ वायु है, अतः ये पर्याय नहीं हैं। ‘कुल’ का अर्थ वंश या योग होता है, जबकि ‘कूल’ का अर्थ किनारा होता है—ये ‘श्रुतिसम भिन्नार्थक’ शब्द हैं। इसलिए, केवल विकल्प ‘a’ ही सही पर्यायवाची युग्म प्रस्तुत करता है। शब्द निर्माण की इस कला को समझकर हम अपनी शब्दावली को अधिक व्यापक और प्रभावशाली बना सकते हैं।
आज संचार माध्यमों में हिंदी भाषा के किस रूप का प्रयोग होता है?
आधुनिक युग में समाचार पत्रों, टेलीविजन चैनलों, रेडियो और डिजिटल मीडिया (इंटरनेट) में हिंदी के जिस रूप का उपयोग किया जाता है, उसे ‘खड़ी बोली’ या ‘मानक हिंदी’ (Standard Hindi) कहा जाता है। यद्यपि हिंदी की कई समृद्ध बोलियाँ जैसे ब्रज, अवधी और भोजपुरी हैं, लेकिन वे मुख्य रूप से क्षेत्रीय और साहित्यिक स्तर पर अधिक लोकप्रिय हैं।
खड़ी बोली ने 19वीं शताब्दी के बाद से अपनी व्याकरणिक स्पष्टता और सरलता के कारण व्यापक स्वीकार्यता प्राप्त की। आज यह भारत की राजभाषा है और देश के विभिन्न हिस्सों के लोगों के बीच संवाद का सेतु बनी हुई है। संचार माध्यमों में इसका प्रयोग इसलिए किया जाता है ताकि सूचनाएँ बिना किसी क्षेत्रीय भाषाई बाधा के जन-जन तक सुस्पष्ट रूप में पहुँच सकें। अतः, वर्तमान संचार प्रणाली की रीढ़ ‘खड़ी बोली’ ही है।
बाबा ने मुकेश को डंडा मारा, कौन सा कारक है ?
वाक्य में क्रिया को संपन्न करने के लिए जिस साधन या उपकरण का उपयोग किया जाता है, उसे ‘करण कारक’ कहा जाता है। इसका विभक्ति चिह्न ‘से’ या ‘के द्वारा’ होता है। इस वाक्य में ‘मारने’ की क्रिया ‘डंडे’ की सहायता से की जा रही है, अतः ‘डंडा’ यहाँ माध्यम या साधन है।
यद्यपि वाक्य में ‘बाबा’ कर्ता है और ‘मुकेश’ कर्म है, लेकिन जब प्रश्न विशेष रूप से क्रिया के साधन पर केंद्रित होता है, तो वह करण कारक की श्रेणी में आता है। व्याकरणिक रूप से इसे ऐसे समझा जा सकता है: “किसके द्वारा मारा गया?” उत्तर मिलता है “डंडे के द्वारा”। करण कारक वाक्य में यह स्पष्ट करता है कि कर्ता ने क्रिया करने के लिए किस वस्तु का सहारा लिया है। अतः यहाँ करण कारक ही सबसे उपयुक्त उत्तर है।

नीचे दिये गए विकल्पों में से तद्भव शब्द का चयन कीजिए ?
हिंदी शब्दावली में शब्दों के चार स्रोत मुख्य हैं: तत्सम, तद्भव, देशज और विदेशी। ‘तद्भव’ वे शब्द हैं जो संस्कृत (तत्सम) से परिवर्तित होकर आधुनिक हिंदी में आए हैं। ‘मुँह’ एक तद्भव शब्द है, जिसका मूल संस्कृत शब्द ‘मुख’ है। समय के साथ भाषाई सरलता के कारण ‘मुख’ बदलकर ‘मुँह’ हो गया।
विकल्प ‘अमिय’ (अमृत का तद्भव रूप है, लेकिन यहाँ यह स्वयं अर्ध-तत्सम जैसा व्यवहार करता है), ‘अग्नि’ एक तत्सम शब्द है, और ‘बैंक’ एक अंग्रेजी (विदेशी) शब्द है। तद्भव शब्दों का प्रयोग हिंदी को अधिक सहज और जनसामान्य की भाषा बनाता है। व्याकरणिक दृष्टि से तद्भव और तत्सम के बीच का अंतर समझना भाषा की ऐतिहासिक यात्रा को समझने जैसा है। अतः ‘मुँह’ यहाँ शुद्ध तद्भव शब्द है।
जंगम का विलोम होगा ?
विलोम शब्द वे होते हैं जो एक-दूसरे का विपरीत अर्थ प्रकट करते हैं। ‘जंगम’ का अर्थ है ‘चलायमान’ या वह जो एक स्थान से दूसरे स्थान पर जा सके (सजीव या गतिशील वस्तुएं)। इसका ठीक विपरीत अर्थ देने वाला शब्द ‘स्थावर’ है, जिसका अर्थ है ‘स्थिर’ या वह जो एक ही स्थान पर टिका रहे (जैसे पेड़, पहाड़ या भवन)।
विकल्पों में दिए गए ‘अगम’ का विलोम सुगम होता है, और ‘चंचल’ का विलोम स्थिर या शांत होता है। दर्शन और व्याकरण में ‘जंगम’ और ‘स्थावर’ का जोड़ा बहुत प्रसिद्ध है, जो सृष्टि की गतिशीलता और स्थिरता के बीच संतुलन को दर्शाता है। प्रतियोगी परीक्षाओं में यह प्रश्न अक्सर पूछा जाता है क्योंकि इसके अर्थ थोड़े दार्शनिक और क्लिष्ट होते हैं। अतः, जंगम का सटीक विलोम ‘स्थावर’ ही है।
दिए गए शब्दों में शुद्ध वर्तनी वाला शब्द है ?
हिंदी वर्तनी में शुद्धता का विशेष महत्व है, क्योंकि एक छोटी सी मात्रा या आधे अक्षर की गलती अर्थ का अनर्थ कर सकती है। ‘ज्योत्स्ना’ शब्द का अर्थ ‘चाँदनी’ (Moonlight) होता है। इसकी शुद्ध वर्तनी में ‘ज’ आधा, ‘य’ पर ओ की मात्रा, ‘त’ आधा, और ‘स’ भी आधा होता है।
अक्सर लोग ‘स’ को पूरा लिख देते हैं या ‘त’ को पूरा, जो कि व्याकरणिक रूप से त्रुटिपूर्ण है। शब्द की उत्पत्ति संस्कृत की ‘ज्योति’ धातु से हुई है। शुद्ध वर्तनी का ज्ञान न केवल लेखन को प्रभावशाली बनाता है, बल्कि यह उच्च कोटि की भाषा दक्षता का भी परिचायक है। हिंदी की मानक वर्तनी के अनुसार विकल्प ‘b’ ही एकमात्र सही रूप है।
केला का तत्सम शब्द हैं ?
‘तत्सम’ शब्द वे होते हैं जो संस्कृत से बिना किसी परिवर्तन के हिंदी में आए हैं। हमारे दैनिक जीवन में प्रयुक्त होने वाला शब्द ‘केला’ वास्तव में एक तद्भव शब्द है, जिसका मूल संस्कृत रूप ‘कदली’ है। प्राचीन ग्रंथों और आयुर्वेद में भी इस फल का उल्लेख ‘कदली फल’ के नाम से मिलता है।
साहित्यिक दृष्टि से देखें तो कवियों ने नायिका की जंघाओं की सुंदरता की तुलना ‘कदली स्तंभ’ (केले के तने) से की है। अन्य विकल्प जैसे केलक या कदल व्याकरणिक रूप से अशुद्ध हैं या अपभ्रंश मात्र हैं। तत्सम शब्दों का प्रयोग अक्सर औपचारिक लेखन और पूजा-पाठ की शब्दावली में अधिक किया जाता है। अतः, केला का शुद्ध तत्सम रूप ‘कदली’ ही स्वीकार्य है।
कौन सा शब्द गुणवाचक विशेषण है ?
जो शब्द किसी संज्ञा या सर्वनाम के गुण, दोष, रंग, आकार, दशा या स्वभाव का बोध कराते हैं, उन्हें ‘गुणवाचक विशेषण’ कहते हैं। यहाँ ‘लाल’ शब्द ‘फूल’ (संज्ञा) के रंग की विशेषता बता रहा है, जो कि उसका एक गुण है। अतः ‘लाल फूल’ में ‘लाल’ गुणवाचक विशेषण का उत्तम उदाहरण है।
अन्य विकल्पों को देखें तो ‘पाँच’ एक संख्यावाचक विशेषण है, जबकि ‘कुछ’ और ‘थोड़ा’ परिमाणवाचक विशेषण के अंतर्गत आते हैं। गुणवाचक विशेषण भाषा को चित्रात्मकता प्रदान करते हैं, जिससे पाठक या श्रोता के मन में वस्तु की एक स्पष्ट छवि बन जाती है। व्याकरण में यह विशेषणों का सबसे विस्तृत और महत्वपूर्ण भेद माना जाता है।
गंगाजल में कौन सा समास है?
‘गंगाजल’ शब्द का समास विग्रह करने पर हमें ‘गंगा का जल’ प्राप्त होता है। यहाँ ‘का’ विभक्ति चिह्न का प्रयोग हुआ है, जो ‘संबंध कारक’ को दर्शाता है। जिस समास में उत्तर पद (दूसरा शब्द) प्रधान हो और विभक्ति चिह्नों का लोप हो, उसे ‘तत्पुरुष समास’ कहते हैं।
चूँकि यहाँ जल का संबंध गंगा से बताया गया है, इसलिए यह ‘संबंध तत्पुरुष’ का उदाहरण है। द्वंद्व समास में दोनों पद प्रधान होते हैं (जैसे माता-पिता), और कर्मधारय में विशेषण-विशेष्य का संबंध होता है। गंगाजल एक पवित्र संज्ञा है और तत्पुरुष समास के माध्यम से यह दो पदों के बीच के गहरे संबंध को परिभाषित करता है। अतः विकल्प ‘a’ व्याकरण सम्मत है।
हिन्दी साहित्य का नौवाँ रस कौन-सा है ?
प्राचीन भारतीय काव्यशास्त्र में भरतमुनि ने अपने ‘नाट्यशास्त्र’ में मूलतः आठ रसों का वर्णन किया था। लेकिन परवर्ती आचार्यों, विशेषकर आचार्य मम्मट और अभिनवगुप्त ने ‘शांत रस’ को नौवें रस के रूप में प्रतिष्ठित किया। शांत रस का स्थायी भाव ‘निर्वेद’ (वैराग्य) है।
जहाँ संसार की अनित्यता और परमात्मा के ज्ञान से मन में शांति और वैराग्य का भाव उत्पन्न हो, वहाँ शांत रस की निष्पत्ति होती है। वात्सल्य और भक्ति रस को बाद के काल में रसों की श्रेणी में जोड़ा गया, लेकिन शास्त्रीय गणना में नौवाँ स्थान शांत रस को ही प्राप्त है। साहित्य में यह रस मनुष्य को आध्यात्मिक शांति और मोक्ष की ओर प्रेरित करता है, जो इसे अन्य रसों से विशिष्ट बनाता है।
निम्नलिखित में से कौन-सा शब्द शब्दकोश में सबसे पहले आएगा ?
हिंदी शब्दकोश (Dictionary) में शब्दों का क्रम वर्णमाला के अनुसार होता है, लेकिन एक महत्वपूर्ण नियम यह है कि अनुस्वार (अं) और चंद्रबिंदु (अँ) वाले वर्ण सामान्य स्वरों से पहले आते हैं। इस आधार पर ‘अं’ से शुरू होने वाले शब्द ‘अ’ या ‘आ’ से पहले स्थान पाते हैं।
विकल्प ‘अंकुर’ और ‘अंबर’ दोनों ‘अं’ से शुरू होते हैं, इसलिए इनका मुकाबला पहले होगा। अब दूसरे अक्षर को देखें: ‘अंकुर’ में ‘क’ है और ‘अंबर’ में ‘ब’। वर्णमाला में ‘क’, ‘ब’ से काफी पहले आता है, इसलिए ‘अंकुर’ शब्दकोश में सबसे पहले स्थान पर होगा। ‘आग’ (स्वर) और ‘कमल’ (व्यंजन) इनके बाद आएंगे। यह तर्क प्रतियोगी परीक्षाओं में शब्द क्रम को समझने के लिए अत्यंत उपयोगी है।
‘बहाव’ शब्द में प्रयुक्त प्रत्यय कौन-सा है ?
प्रत्यय वे शब्दांश होते हैं जो किसी मूल शब्द या धातु के अंत में जुड़कर उसके अर्थ में परिवर्तन या विशेषता ला देते हैं। ‘बहाव’ शब्द ‘बह’ धातु (क्रिया का मूल रूप) में ‘आव’ प्रत्यय जोड़ने से बना है। ‘बह’ का अर्थ है बहना, और ‘आव’ प्रत्यय इसमें जुड़कर एक भाववाचक संज्ञा का निर्माण करता है।
अक्सर छात्र ‘हाव’ को प्रत्यय समझने की भूल करते हैं, लेकिन व्याकरणिक विच्छेद ‘बह + आव’ ही सही है। इसी प्रकार ‘चढ़ाव’, ‘तनाव’ और ‘खिंचाव’ शब्दों में भी ‘आव’ प्रत्यय का ही प्रयोग हुआ है। प्रत्ययों का सही ज्ञान हमें शब्दों की मूल संरचना और उनकी प्रकृति (संज्ञा, विशेषण आदि) को पहचानने में मदद करता है। अतः विकल्प ‘c’ सही है।
कौन-सा अमानक वर्ण है ?
‘अमानक वर्ण’ वे वर्ण कहलाते हैं जो पुराने समय में हिंदी लेखन में प्रचलित थे, लेकिन आधुनिक ‘मानक हिंदी’ वर्णमाला में उन्हें बदल दिया गया है या उनके स्थान पर नए रूपों को स्वीकार कर लिया गया है। विकल्प ‘c’ में ‘झ’ का जो पुराना रूप (जो प्रायः ‘ल’ और ‘र’ के मिश्रण जैसा दिखता था) दिया गया है, वह अब अमानक है।
केंद्रीय हिंदी निदेशालय ने देवनागरी लिपि के मानकीकरण के दौरान ऐसे वर्णों को हटाकर एक स्पष्ट और सरल रूप प्रदान किया है ताकि मुद्रण और पढ़ने में भ्रम न हो। ‘ख’, ‘ध’ और ‘भ’ के आधुनिक रूप मानक हैं और वर्तमान शिक्षा प्रणाली में मान्य हैं। अमानक वर्णों की पहचान करना भाषा के क्रमिक विकास और उसके आधुनिकीकरण को समझने के लिए आवश्यक है।
अब बारी है अगले कदम की! अगर आप भी किसी competitive exam को क्रैक करने का जुनून रखते हैं, तो इस पोस्ट को अभी Bookmark कर लीजिए ताकि फ्यूचर में रिवीज़न के समय यह आपके काम आ सके। हमारी वेबसाइट पर ऐसे ही ढेरों informative और interesting टॉपिक्स मौजूद हैं, तो उन्हें एक्सप्लोर करना बिल्कुल न भूलें।
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